THREE WAY

THREE WAY 

There are three types of people in the world, so there are three way to go inside .In which one is emotion dominant, who are very comfortable and follow their heart, the other is karma(work) dominant, they give more importance only to karma, they focus more on the body and the third is knowledge. They are dominant, they give more importance to their intelligence and we are one of these three.

    If an emotional man or woman connects his feelings with God, then his life is filled with devotion, love and joy and dedication starts bearing fruit in it, which we call "thatha" and this is called Bhakti Yoga.

    There is a lot of ego in a work-oriented person and the work-oriented person who does work by leaving his ego or we can also say that the person who does the work without being a doer, that I am not the existence or the Supreme God than me. One who knows that he does as he is asked to do, is called a Karmayogi and such a person lives in supreme bliss. He doesn't care at all.
    
    A person who lives with thoughts, when his intellect is felt in the world, then he can be a great scientist, philosopher etc. But the person who turns these thoughts towards himself, looks at his inner self, becomes a seer, then he becomes conscious. He is filled with thoughts and his thoughts start falling slowly and when the thoughts are finished completely, then such a man is considered to be available and this realization is the height of happiness.

दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं, इसलिए अंतर्यात्रा के तीन ही रास्ते है , जिनमें एक भावना प्रधान होते हैं, जो बहुत सहज होते हैं और अपने दिल की सुनते हैं, दूसरे कर्म प्रधान होते हैं, वे कर्म को ही अधिक महत्व देते हैं, शरीर पर अधिक ध्यान देते हैं और तीसरा ज्ञान पर अधिक ध्यान देते हैं, वे प्रभावशाली हैं, वे अपनी बुद्धि को अधिक महत्व देते हैं और हम इन तीनों में से एक हैं।

 

    यदि कोई भावुक पुरुष या महिला अपनी भावनाओं को ईश्वर से जोड़ देता है तो उसका जीवन भक्ति, प्रेम और आनंद से भर जाता है और इसका  फल समर्पण है , जिसे हम "तथाता " कहते हैं और इसे ही भक्ति योग कहा जाता है।

 

    कर्म-प्रधान व्यक्ति में अहंकार बहुत होता है और जो कर्म-प्रधान व्यक्ति अपने अहंकार को त्यागकर कर्म करता है या हम यह भी कह सकते हैं कि जो व्यक्ति कर्ता न रहकर कर्म करता है, वह  जानता है कि वह वैसा ही करता है जैसा उसे करने के लिए कहा जाता है, मतलब जैसा कर्म उसकी नियति  उससे करवाती है वह सहज होकर करता है ऐसा कर्तापन रहित कर्मयोगी कहलाता है और ऐसा व्यक्ति परम आनंद में रहता है। उसे बिल्कुल भी परवाह नहीं है !

    

    जो व्यक्ति विचारों के साथ जीता है, उसकी बुद्धि जब संसार में लगती है तो वह महान वैज्ञानिक, दार्शनिक आदि हो सकता है, लेकिन जो व्यक्ति इन विचारों को अपनी ओर मोड़ लेता है, अपने अंतर्मन की ओर देखता है, द्रष्टा बन जाता है, फिर चेतन हो जाता है और उसके विचार धीरे-धीरे कम होने लगते हैं और जब विचार पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं, तो ऐसा व्यक्ति बोद्ध को उपलब्ध माना जाता है और यह अहसास परम आनंद  की पराकाष्ठा है।

 











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