भक्तिमार्ग

 भक्तिमार्ग 

भगवान कृष्ण ने गीता में कंहा है "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।"सभी धर्मों को छोड़ कर, एक मेरे ही शरण आ जा। भाव है। मुक्त कर दूंगा,सोच मत करो। यह बात भगवान ने उन भक्तो के लिए कंही है जो बहुत अहंकारी है और जो कर्म ध्यान आदि में गहनता से लगे है पर उन्हें अभी तक परमात्मा अर्थात आत्मबोध नहीं हुआ ! हालाँकि यह बात सभी पर लागू होती है की जो सब विचार ,कर्म आदि उस परमात्मा के ऊपर छोड़कर उसके शरण जो चला जाता है वह उन्हें सहज ही उपलब्ध हो जाता है और यह ही भक्तियोग की प्रथम सीडी है और ज्ञानयोग ,कर्मयोग आदि की अंतिम !

भक्तिमार्ग बहुत ही सहज और सरल है इसलिए अहंकारी लोगो के यह समझ नहीं आता जब तक उनका अहंकार टूट न जाये खंडित न हो जाये ! भक्त परमात्मा और संसार को अलग अलग नहीं मानता अपितु एक ही मानता है और जानता है की परमात्मा अगर एक पहलु है तो संसार परमात्मा का ही दूसरा पहलु है जिसे ज्ञानी जन माया आदि का नाम देते है ! ज्ञान योग के साधक परमात्मा के माया रूपी संसार को छोड़ने पर ज्यादा जोर देते है जिसके कारन उनका अद्वैत वाद रुखा सुखा होता है जबकि भक्त संसार को और परमात्मा को एक रूप देखता है और उसका अद्वैतवाद हराभरा और प्रेम पूर्ण होता है भक्त सब स्वीकार करता है और जिसमे स्वीकार भाव होता है वह हमेशा आनंद में जीता है जबकि ज्ञानयोग के साधक जिस माया रुपी संसार को छोड़कर जंगल, गुफा ,हिमालय आदि जगह जाते है वो  वंहा भी अपने  विकारो से घिरे रहते है और दुखी रहते है क्यूंकि जंहा विरोध होगा वंहा दुःख तो होना ही है !

एक समय जरूर आता है भक्त का जब उसे भक्ति भाव को भी छोड़ना पड़ता है ,छोड़ना शब्द यंहा ठीक नहीं हम कहंगे छुट जाता है क्यूंकि प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय !! जैसे जब बीमार आदमी स्वस्थ हो जाता है तो उसकी ओषधि छुट जाती है ऐसे ही जब भक्त और भगवान् एक हो जाते है तब शुद्ध अद्वैत प्रकट होता है जिसे भक्त पराभक्ति और ज्ञानीजन समाधी कहते है दोनों एक ही है बस मार्ग अलग अलग है एक नाचता हुआ आता है और एक विचार, ध्यान आदि कर करके आता है ! 


भक्तिमार्ग







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