भक्तियोग

 भक्तियोग 

पहले के मनुष्य का चित आज के मुकाबले बहुत शुद्ध होता था इसलिए वो कर्मकांड जैसे हवन , उपवास आदि स्थूल(शरीर ) तल पर की जाने वाले मार्गो से भी उस परम तत्व को पा लेते थे ! फिर धीरे धीरे मनुष्य की बुद्धि का विकास होने लगा और वो ज्ञान मार्ग के साधन पर चल पड़े जैसे विचार ,सत सास्त्रो का चिन्तन मनन , निधिध्यासन ,ध्यान आदि जो एक सूक्ष्म मार्ग है और  बुद्धि तल पर स्थित लोगो के लिए है जिसे हम ज्ञानयोग के नाम से जानते है    पर आज का मनुष्य इतना विकसित हो चुका है अर्थात अहंकारी हो चूका है की आज उसके न तो कर्मकांड काम आता है  और न ज्ञान ध्यान आदि ,वो जितना ज्यादा इसमें उतरते है  उनका अहंकार उतना ही ज्यादा सुक्ष्म और जटिल होता चला जाता है इसलिए आज उनके लिए सिर्फ एक ही मार्ग है और वो है भक्ति ! जिसे हम भक्तियोग के नाम से जानते है !

भक्ति योग की साधना ह्रदय के तल पर होती है इसमें भाव ही प्रधान होता है ! पहले का मनुष्य जो भी करता था वो अहंकार रहित होने के कारन भक्ति मार्ग ही था पर स्थूल रूप से कर्मकांड आदि दिखाई देता था जिसके कारण उसे कर्मयोग बोला गया ! ज्ञानयोगी जब विचार कर करके थक जाता था या ऐसे कन्हे ध्यान करते करते जब उसका अन्तःकरण  शुद्ध हो जाता था ,अहंकार रहित हो जाता था ,समर्पित हो जाता था तब उसे उस परम तत्व की प्राप्ति होती थी ! ज्ञानयोग की साधना भी अंत में समर्पण (भक्ति ) का ही रूप लेती थी अतः निष्कर्ष यह निकलता है की भक्ति ही परम है उसके सिवा अन्य कोई मार्ग नहीं बाकी मार्ग तो सिर्फ निमित है !आज का मनुष्य इतना विकसित हो चूका है की उसे आज बेलगाडी की जरुरत नहीं है उसे आज हवाई जहाज ,कार की जरुरत है बस ऐसी ही है यह भक्ति! इसलिए आज  भक्तिमार्ग पर चलकर ही आसानी  से उस  परमतत्व को  पाया जा  सकता है !

भक्तियोग

आज का मनुष्य इतना अशुधि से भरा है की वो  जो कर्म करेगा वो उसके ऊपर नहीं हो सकता ! एक अशुद्ध चित से निकला हुआ कर्म अशुद्ध ही होता है जैसे कीचड़ में फंसा हुआ छोटा बच्चा कीचड़ में जितने हाथ पांव मारता है वो उतना कीचड़ में अशुद्ध होता चला जाता है  उसके पास सिर्फ अपनी माँ को पुकारने के सिवा अन्य कोई मार्ग नहीं और जब वो रो रो कर अपनी  माँ को पुकारता है तब उसकी माँ उसे उस कीचड़ से निकाल  लेती है बस ऐसी ही है यह भक्ति ! अतः अब तुम्हारे पास उस परमात्मा को पुकारने के अलावा अन्य कोई मार्ग नहीं है तुम्हारी पुकार जितनी सच्ची होगी उतनी ही जल्दी यह उस परम तत्व द्वारा सुनी जाएगी ! अतः अंत में यह कहना चाहूँगा की कर्मकांड , ज्ञान -ध्यान आदि के चक्करों में ज्यादा न पड़ो सिर्फ भक्ति करो उसके चरणों में अपने आपको समर्पित कर दो तभी मिलेगा वो प्रियतम ! अगर मेरी बात पर विस्वास नहीं है तो ज्ञान ध्यान आदि के मार्ग पर चल कर देख लो अंत में आना पड़ेगा भक्ति में ही, उसके सिवा अन्य कोई मार्ग नहीं !

भक्तियोग






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