समर्पण

समर्पण 

सब उसका है ,मालिक का है हम भी मालिक के ,संसार भी उसका ,सब उसका ,जैसी उसकी मर्जी वैसे जियेंगे ,जैसा वो चलाएगा वैसा चेलेंगे हम अपने संकल्प को आरोपित नहीं करेंगे ,हम चेष्टा से नहीं जियेंगे ,हम ऐसे बह्नेगे जैसे नदी की धार मे बह जाए ,हम तैरेंगे नहीं यह भाव समर्पण है !उस मालिक के रहते हम अपना संकल्प क्यों बीच में लाये , संकल्प आया की अहंकार आया ,अहंकार आया की हम भटके ,हम तो बिना अहंकार के जियेंगे ,उसकी जैसी मर्जी, जैसे सुखा पत्ता हवा में उड़े ,पश्चिम जाये के उत्तर उसे कोई चिंता नहीं ,बस ऐसे ही जीना समर्पण है !

सुख - दुःख में विचलित न होने वाला ,  सदा संतुष्ट और आनंदित रहने वाला ही मनुष्य ही समर्पण में जीता है , उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती! वह संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर, ममतारहित, अहंकार रहित और स्पृहा रहित अर्थात् अपेक्षा रहित आचरण के साथ अपना जीवन यापन करते हुए शांति को प्राप्त होता है।

जीवन जीने के दो ढंग 

जीवन के जीने को दो ढंग है एक ढंग है संघर्ष का और एक ढंग है समर्पण का ! संघर्ष का अर्थ है मेरी मर्जी समग्र की मर्जी से अलग है जबकि  समर्पण का अर्थ है में समग्र का एक अंग हूँ मेरी मर्जी के अलग होने का कोई सवाल नहीं, मैं अगर अलग  हूँ संघर्ष स्वाभाविक हैं मैं अगर इस विराट  के साथ एकहूँ  तो समर्पण स्वाभाविक हैं! संघर्ष लाएगा तनाव ,अशांति ,चिंता और समर्पण लायेगा शुन्यता ,शांति ,आनंद और अंतत: परम ज्ञान ! संघर्ष से  बढेगा अहंकार और समर्पण से मिटेगा !संसारी वही है है जो संघर्ष कर रहा है धार्मिक वहि है जिसने संघर्ष छोड़ा और समर्पण किया ! मंदिर ,मस्जिद ,गुरूद्वारे जाने से धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं अगर तुम्हारी व्रती संघर्ष की है ,अगर तुम लड़ रहे हो परमात्मा से ,अगर तुम अपनी इच्छा पूरी कराना चाहते हो , चाहे प्रार्थना से ही सही ,पूजा से सही ,अगर तुम्हारी अपनी कोई इच्छा है तो तुम अधार्मिक हो ,जब तुम्हारी अपनी कोई चाह नहीं जब उसकी चाह ही तुम्हारी चाह है जंहा वो ले जाये वही तुम्हारी मंजिल है ,तुम्हारी अपनी कोई मंजिल नहीं ! जैसा वो चलाये वही तुम्हारी गति है तुम्हारी अपनी कोईआकांक्षा नहीं , तुम निर्णय लेते नहीं , तुम तैरते भी  नहीं तुम तिरते हो , आकाश में कभी देखीं  है चील बहुत ऊँचाई पर उड़ जाती है फिर पंख भी नहीं हिलाती , सिर्फ पंखो को फैला देती है और हवा में तिरती है वैसी ही तिरने की अवस्था तुम्हारी चेतना में आ जाये तब समर्पण ! तब तुम पंख भी नहीं हिलाते तब तुम उसकी हवाओ पर तीर जाते हो तब तुम र्निभार हो जाते  हो क्यूंकि भार संघर्ष से पैदा होता है भार प्रतिरोध से पैदा होता है जितना तुम लड़ते हो उतना तुम भारी  हो जाते हो जितने भारी हो जाते हो उतने नीचे गिर जाते हो ! जितना तुम लड़ते नहीं उतना हल्के हो जाते हो ,जितने हल्के  होते हो उतने ऊपर उठ जाते हो और अगर तुम पूरी तरह संघर्ष छोड़ दो तो तुम्हारी वही ऊँचाई है जो परमात्मा की है , ऊँचाई का एक ही अर्थ है निर्भार  हो जाना और अहंकार पत्थर की तरह लटका हुआ है तुम्हारे गले में , जितना तुम लड़ोगे उतना ही अहंकार बढेगा ! जब तुम में अहंकार होता है तब दुसरे को तुम से चोट पंहुचती है जब तुम निर्भार हो जाते हो तब तुम्हारे जीवन का ढंग ऐसा होता है उस ढंग से चोट पंहुचना असंभव हो जाती है ,अहिंसा अपने आप फलती है ,प्रेम अपने आप लगता है ! कोई प्रेम को लगा नहीं सकता और न ही कोई करुना को आरोपित कर सकता है अगर तुम निर्भार हो जाओ तो यह सब घटनाये अपने से घटती है जैसे आदमी के पीछे छाया चलती है ऐसे भारी आदमी के पीछे घृणा ,वैमनस्य ,क्रोध ,हिंसा ,हत्या चलती है ! हल्के मनुष्य के पीछे प्रेम ,करुना ,दया ,प्रार्थना अपने आप चलती है ! इसलिए  मौलिक सवाल भीतर से अहंकार को गिरा देने से है कैसे तुम गिराओगे इस अहंकार को ,एक ही उपाय है और वो है समर्पण !

सब भार उसी पर है 

सब भार उसी पर है पर तुम अकारण ही बोझ अपने ऊपर लिए हुए हो जैसे कोई रेलगाड़ी में सवार होकर ,अपने  सामान को कोई अपने सर पर ही लादे रहे ! तुम अपनी छोटी बुद्धि से छोटे दायरे में सोचते हो तुम्हारे कारण परमात्मा नहीं है परमात्मा के कारन तुम हो ! यह श्वास तुम्हारे कारन नहीं चल रही  परमात्मा के कारन चल रही है , प्रार्थना भी तुम नही करते हो वही तुम्हारे भीतर प्रार्थना बनता है , वहीँ तुम्हारे दिल की धड़कन बन धड़क रहा है !तुम वहीँ करते हो जो तुमसे वो करवाता है पर जिम्मेवारी तुम लेते है इसलिए ही तुम इतने दुखी हो अगर तुम सब भार उसी पर छोड़ दो तो अभी यंही परम आनंद को पा लो !

परमात्मा का दूसरा नाम नियम है और जो होता है नियम के अनुसार ही होता है इसलिए अगर तुम अपनी पूरी शक्ति क्रोध में या इर्ष्या में लगा दोगे तो तुम बलात नरक की तरफ चलने लगोगे , नहीं चाहोगे तो तो भी जाओगे ! अगर तुम पूरी शक्ति प्रेम की तरफ लगा दोगे तो तुम बलात स्वर्ग की तरफ जाने लगोगे चाहे चाहो या न चाहों , तुम्हारे  जीवन में सुख उतरने लगेगा और अगर तुम समर्पण कर दोगे तो तुम मोक्ष में चलने लगोगे ! बस यही नियम है और यह तुम पर निर्भर है की तुम कौन से नियम पर चलते हो ! इसलिए ही तो गीता में कहा है सर्व-धर्मन् परित्यज्य मम एकम् शरणम व्रज: " अन्य सभी कर्तव्यों को छोड़ दो और मेरी शरण में आ जाओ ।"

समर्पण

तथाता –सब स्वीकार

यह संसार एक लीला है एक नाटक है इसमें हमे जैसा भी अभिनय मिले उसे बिना शिकायत के पूर्ण रूप से बिना संकोच के निभा देना तथाता है तथाता मतलब सब स्वीकार ,कोई शिकायत नहीं ! हम जैसे भी है उसे स्वीकार कर लेना ,कोई परिवर्तन की मांग नहीं ! तुम्हारी परिवर्तन की मांग ही तुम्हारे समर्पण में बाधा है ! अगर तुम क्रोधी हो तो उसे स्वीकार करो ,कामी हो तो उसे स्वीकार करो और जैसे ही तुम स्वीकार करते हो तुम देखोगे तुम्हारे अंदर परिवर्तन शुरू हो गया ! हमे जैसा भी इस संसार रुपी रंगमंच में अभिनय करने का काम मिला हुआ है उसे सहज स्वीकार कर पूरा कर देना ही उस काम की सार्थकता है ! अगर रावन भी अपना रावन का अभिनय पूरी तरह निभाता है तो वह राम हो गया और अगर राम अपने काम में संकोच करता है तो वह राम नहीं हुआ ,कहने का तात्पर्य यह है की हम जैसे भी है उसे सहज सवीकार कर लेना चाहिए अगर हम गुलाम है तो इस तथाता में ,स्वीकार भाव में आने पर हमारी गुलामी भी स्वतंत्रता हो जाती है !

तथाता का मतलब है पूर्ण समर्पण ! जो मनुष्य पूरी तरह से समर्पित होता है तो उसकी अवस्था गुनातीत होती है फिर उसे प्रक्रति के गुण चलायमान नहीं कर पाते वो सिर्फ उनका द्रष्टा होता है मन में कोई भी विकार काम ,क्रोध आदि उठने पर भी उनका द्रष्टा या तथाता के भाव में होने पर इन विकारों या यूँ कहे प्रक्रति के गुणों को हमारा कोई सहारा न मिलने पर वे विकार खुद ही गिर जाते है !




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