श्रद्धा

 श्रद्धा

श्रद्धा असीम होती है और जिस श्रद्धा की कोई सीमा होती है वह श्रद्धा नहीं होती है वह सिर्फ श्रद्धा की एक भ्रान्ति होती है अगर कोई कन्हे की मुझे सिर्फ गंगा नदी में तैरना आता है नर्मदा में नहीं तो क्या उसे आप कहोगे की आप असली तैराक है नहीं न , क्यूंकि जिसे तैरना आता है वह सभी नदियों में तैर सकता है !ऐसे ही जो श्रद्धा  से भरा होता है वह सभी धर्मों और गुरुओ को अपने अंदर आत्मसात कर लेता है उसे इससे कोई नहीं फर्क पड़ता कौन गुरु या धर्म कैसा है उसे सिर्फ सत्य से मतलब होता है और जिसकी भी ऊँगली उस सत्य की तरफ इशारा करती है वह इशारे को पकड़ कर आगे बढ़ता है ,वो उस ऊँगली को पकड़कर उससे बंधता नहीं !

अभिव्यक्ति 

जैसे एक बगिया में अनेक प्रकार के फूल होते है ऐसे ही सभी धर्मो और गुरुओ की अपनी अपनी अभिव्यक्ति होती है पर वो सब एक ही सत्य की तरफ इशारा  करती है इसलिए जिसको जो भी अभिव्यक्ति रुचिपूर्ण लगे वो उसके साथ हो सकता है पर रूचिपूर्ण न लगने के कारन इसका यह मतलब नहीं है की उसकी अभिव्यक्ति गलत है इसका मतलब यही है की उसकी अभिव्यक्ति आपके व्यक्तित्व और रुचि से मेल नहीं खाती इसलिए आपको उसको छोड़कर अपने  व्यक्तित्व और रुचि के हिसाब से आगे बढ़ते रहना है  जब तक सत्य से आपका आत्मसाक्षात्कार न हो जाये !

दीक्षा 

बहुत से गुरु ऐसे होते है जो अपने शिष्य को खुद  से ऐसे बाँधने की कोशिश करते है जैसे उनके साथ उसने विवाह कर लिया हो! ऐसे गुरु को डर रहता है की कंही दूसरी जगह चले जायंगे तो उनकी समाज में क्षवी खराब हो जाएगी और जो शिष्य छोड़कर जाना चाहता है उसको दीक्षा आदि देकर बाँधने की कोशिश की जाती है और एक ही गुरु के अनुसार चलने को विवश किया जाता है अगर आप भी ऐसे ही गुरु से बंधे हो तो तत्काल वंहा से निकल जाए क्यूंकि बाँधने वाला गुरु कोई गुरु नहीं होता अपितु पाखंडी होता है ! मेरे दीक्षा से तात्पर्य शिष्य को सत्य की तरफ उन्मुख होने के लिए उसके पंख लगाने जैसा है ताकि वो सत्य की तरफ तत्परता से उन्मुख हो सके उसको अपने से बाँधने से नहीं पर जो गुरु बाँधने की कोशिश करता है वो असली गुरु नहीं है बल्कि एक शोषण कर्ता है !


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