Donation Definition & Meaning

दान का महत्व 

हिन्दू सास्त्रोमें दान का महत्व बहुत ज्यादा बताया गया है उनके अनुसार अगर आप यंहा दान करोगे तो परलोक में आपको इसके कई गुना ज्यादा मिलेगा ! यह सब बाते उन पंडित पुरोहित , ऋषि -मुनियों द्वारा लिखी हुई है जो सिर्फ दान पर ही निर्भर थे उन्होंने यह सब बाते अपने निजी स्वार्थ के लिए ही लिखी थी ! दान का परलोक आदि से कोई लेना देना नहीं है !उस समय पंडित पुरोहितो और साधू संतो की आजीवका का साधन एक मात्र ग्रहस्थ लोगो से प्राप्त दान दक्षिणा ही रहा करता था और ज्ञान -शिक्षा व सास्त्र लेखन का कार्य इन्ही के हाथो में था इसलिए इन्होने वही लिखा जो इनके लिए हितकर था ! इन्होने गृहस्थ को परलोक का भय दिखाया , स्त्री आदि को नरक का द्वार बताया आदि !

अधिकांश लोगो की यह धारणा है की हमे गरीबो  की सहायता करनी चाहिए , उनकी सेवा करनी चाहिए , उनकी दान -पैसा आदि देकर मदद करनी चाहिए लेकिन मेरा मानना यह है ऐसा कर हम उनको पंगु बनाते है अगर हमारी यही धारणा रही तो गरीब  इस दुनिया से कभी कम नहीं होंगे अपितु बढ़ते है चले जायेंगे ! हमने गरीबो को दरिद्र नारायण आदि जैसे शब्द देकर गरीबी को बढ़ावा दिया है ! भारत देश ने गरीबो को बहुत आदर दिया है जिसके कारण आज लोग गरीबी से मुक्त होना ही नहीं चाहते , हम सब चाहते है की हमारा  गरीबी रेखा का राशन कार्ड बने क्यूंकि हमे मुफ्त खोरी की आदत जो पड गई है !

असली जरुरत मंद वो होते है जो सचमुच लाचार है , जिनके हाथ पांव नहीं है मतलब जो कमा खा नहीं सकते या ऐसे लोग या पशु -जानवर जो सिर्फ हम पर ही निर्भर है , ऐसी विधवाए जिनके बच्चे छोटे है और कमाने का कोई साधन नहीं है  या बूढ़े जो अब कमाई नहीं कर सकते और  उनका कोई सहारा नहीं है ये होते है जरुरत मंद  इनकी सहायता जायज है पर विडम्बनाया अकस्मात किसी को हारी बीमारी में सहायता की जरुरत पड़े  यह है आज हमारे देश में भिखारियों की कोई कमी नहीं है !  इस गरीबी और भिखारियों की संख्या में बढ़ोतरी का कारन है हमारा दान को इतना ज्यादा महत्व देना ! जब तक हम दान की महिमा का गुणगान करेंगे तब तक इन भिखारियों की संख्या में कोई कमी नहीं आएगी !

सहज दान का अध्यात्मिक महत्व 

दान का अध्यात्मिक महत्व है अगर दान केवल असली जरुरत मंदों को ही दिया जाए , लेकिन अगर ऐसा दान भी  आपमें अहंकार को उत्पन्न कर दें तो यह दान भी आपके  पतन का कारन हो जाता है इसलिए दान कभी किया नहीं जाता बल्कि होता है ! जो दान आपसे सहज पूर्वक निकले वही असली दान है अगर आप ऐसा मानकर दान करोगे की दान से हमे पुण्य मिलेगा या परलोक में हमे कई गुना होकर मिलेगा तो दो कोडी का है आपका दान !  और दान भी केवल वहीँ कर सकता है जिसके पास दान करने की क्षमता है , अगर आप खुद ही गरीब हो तो आपका दान वैसे ही होगा जैसे खुद के घर में आग लगी हो और आप दुसरे के घर  की आग बुझाने चले ! यह जरुरी नहीं है की आप रुपये पैसे से ही दान करो अगर आपमें क्षमता है तो आप अपनी क्षमता के अनुसार भी दान कर सकते है जैसे पानी पिलाकर , दो शब्द प्रेम पूर्ण  बोलकर या सरारिक  रूप से सहायता कर जैसी भी आपका क्षमता है !

लोभी , क्रपन कभी दान नहीं कर सकता उसके द्वारा  जबरदस्ती किया हुआ  दान उसके लिए निरर्थक ही होता है क्यूंकि वो दान करते समय और बाद में भी दुखी ही होता है इसलिए सहज दान का ही अध्यात्मिक महत्त्व है अगर सहज दान मंदिर ,मस्जिद ,गरु द्वारे या किसी धार्मिक कार्य या सामजिक कार्य में सहयोग के तौर पर भी निकले तो भी सार्थक है !

कन्या दान एक अभिशाप 

हमारे देश में एक रिवाज है की भाई -पिता आदि अपनी बहन या बेटी की शादी के फेरो के समय उसका दान करते है जिसको हम कन्या दान कहते है जो की बिलकुल भी सही नहीं है ! हमारी बहन या बेटी कोई वस्तु या सम्पति नहीं है जिसका दान किया जाये अगर हम ऐसा करते है तो पूरी नारी जाती का अपमान करते है , सभी स्त्रियों को इसका विरोध करना चाहिए ! दो कौड़ी के है वो सास्त्र जिन्होंने स्त्रियों को पुरुष की सम्पति कंहा है , ऐसे सास्त्र को आग लगा देनी चाहिए क्यूंकि भारत हमेशा पुरुष प्रधान देश रहा है और सभी सास्त्र पुरुषो द्वारा ही लिखे गए है और इन्होने वही लिखा जो इनके लिए हितकर था इन्होने स्त्री को नरक का द्वार बताया , स्त्री को वेदों को पढने से रोका जो बिलकुल शर्मनाक बात है ! 
दान की हुई वस्तु या सम्पति को वापिस नहीं लिया जाता इसका मतलब यही है की  हमने कन्या दान कर अपनी बहन या बेटी का अपने घर से , जिस आँगन में पली बढ़ी उसका अपने घर में आने से रोकना ! जो बिलकुल भी तर्क संगत नहीं है ! हमारे दरवाजे हमारी बहन बेटी के लिए हमेशा खुले है , हमे उनका जीवन नरक नहीं बनाना चाहिए बल्कि उसको ऐसी शिक्षा संस्कार देना चाहिए की जन्हा भी वो जाये अपने साथ खुशिया ही खुसिया  ले जाये और वंहा के आँगन को खुशियों से भर दे !

Donation - दान






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